वित्तीय समावेशन की पाठशाला समाचार पटल
केंद्र सरकार और वित्त मंत्रालय की हठधर्मिता तथा दोहरे रवैये के खिलाफ देश का बैंकिंग सेक्टर शुक्रवार को गुस्से की आग में सुलग उठा। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कामकाज पूरी तरह ठप रहा और तालियां बजाकर नीतियां बनाने वाले हुक्मरानों के खिलाफ राजधानी लखनऊ की सड़कों पर बैंककर्मियों का आक्रोश फूट पड़ा। पाँच दिवसीय बैंकिंग व्यवस्था लागू करने, भेदभावपूर्ण पीएलआई (प्रदर्शन से जुड़ी प्रोत्साहन) योजना को तुरंत वापस लेने और लंबित मांगों के निस्तारण को लेकर बैंक कर्मचारियों ने हजरतगंज स्थित इंडियन बैंक के सामने हुंकार भरी।
हड़ताल के दौरान सरकारी व्यवस्था की पोल खोलते हुए फोरम के राज्य संयोजक कॉमरेड वाई.के. अरोड़ा के नेतृत्व में हजारों कर्मियों ने प्रदर्शन किया। सभा को गरजते हुए कॉमरेड दिनेश कुमार सिंह ने सीधा सवाल दागा कि जब देश के केंद्रीय बैंक यानी रिजर्व बैंक, एलआईसी, सेबी और नाबार्ड जैसे तमाम वित्तीय संस्थानों में सप्ताह में पाँच दिन कार्य दिवस का नियम लागू है, तो आखिर देश के आम बैंककर्मियों के साथ यह घोर नाइंसाफी क्यों की जा रही है? क्या सरकारी कर्मचारियों और बैंककर्मियों के मानवाधिकार अलग-अलग हैं?
सरकार द्वारा थोपी गई भेदभावपूर्ण पीएलआई योजना पर कड़ा प्रहार करते हुए वक्ताओं ने कहा कि एक तरफ आम कर्मचारियों का शोषण हो रहा है, वहीं दूसरी ओर बैंकों के उच्चाधिकारियों को लाखों-करोड़ों रुपये पीएलआई के नाम पर बांटे जा रहे हैं। जिला संयोजक अनिल श्रीवास्तव ने दो टूक चेतावनी दी कि अब बैंककर्मी झूठे आश्वासनों के झांसे में आने वाले नहीं हैं, उन्हें केवल ठोस परिणाम चाहिए।
लखनऊ की 905 शाखाओं के करीब 10 हजार बैंककर्मियों के सड़क पर उतरने से बैंकिंग कामकाज बुरी तरह चरमरा गया, जिससे आम जनता को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा। मीडिया प्रभारी अनिल तिवारी ने सरकार को सीधी चेतावनी देते हुए ऐलान किया कि यदि सरकार की नींद अब भी नहीं खुली, तो आगामी 28, 29 और 30 सितंबर को तीन दिवसीय और अक्टूबर माह में अनिश्चितकालीन देशव्यापी हड़ताल करके बैंकिंग व्यवस्था का पहिया पूरी तरह जाम कर दिया जाएगा। सरकार की तानाशाही के खिलाफ यह चिंगारी अब पूरे देश में शोला बन चुकी है।
Vittiya Samaveshan Ki Pathshala
