ड्यूटी, अनुशासन और जिम्मेदारियों के बीच जवानों की जिंदगी पर उठे गंभीर सवाल
वित्तीय समावेशन की पाठशाला | समाचार पटल
देश की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले जवानों के बीच आत्महत्या के बढ़ते मामलों ने एक बार फिर व्यवस्था की चिंता बढ़ा दी है। पिछले पांच वर्षों में CRPF कर्मियों द्वारा आत्महत्या के लगभग 262 मामले सामने आए हैं। इनमें करीब 216 जवान ड्यूटी पर तैनात या सेवा के दौरान सक्रिय बताए गए हैं। आंकड़े केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि उस खामोश संकट की तस्वीर हैं, जो वर्दी के पीछे दबे मानसिक तनाव और व्यक्तिगत संघर्षों की ओर इशारा करते हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 में 57, वर्ष 2022 में 43, वर्ष 2023 में फिर 57, वर्ष 2024 में 46 और वर्ष 2025 में सबसे अधिक 59 आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए। खास बात यह है कि साल दर साल यह समस्या खत्म होने के बजाय लगातार चिंता का विषय बनी हुई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जवानों को इस कगार तक पहुंचाने वाले कारणों की पहचान कितनी प्रभावी ढंग से हो रही है? कठिन ड्यूटी, लंबे समय तक परिवार से दूरी, लगातार तनाव, कार्यभार और व्यक्तिगत समस्याएं—क्या इन सबके बीच मानसिक स्वास्थ्य को पर्याप्त प्राथमिकता मिल रही है?
2025 में दर्ज 59 आत्महत्या के मामले स्थिति की गंभीरता को और गहरा करते हैं। देश की सुरक्षा में दिन-रात जुटे जवानों के लिए मनोवैज्ञानिक सहायता और समय पर काउंसलिंग केवल औपचारिक व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन बचाने की जरूरत बनती जा रही है।
अब जरूरत आंकड़ों पर चिंता जताने से आगे बढ़ने की है। हर मौत के पीछे छिपे कारणों को समझना होगा और ऐसी व्यवस्था तैयार करनी होगी, जहां संकट में फंसा जवान मदद मांग सके—बिना डर, बिना झिझक और बिना किसी सामाजिक दबाव के।

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