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प्याज की कीमतों पर सरकार का ‘कंट्रोल’ अभियान, लेकिन सवालों के घेरे में नीति

पहले निर्यात, अब बफर स्टॉक से बिक्री और आयात की चर्चा—मांग का अनुमान पहले क्यों नहीं? उपभोक्ता और किसान दोनों के हित पर उठे सवाल


वित्तीय समावेशन की पाठशाला | समाचार पटल

 प्याज की कीमतों में संभावित मौसमी उछाल को रोकने के लिए सरकार ने बफर स्टॉक से नियंत्रित और लक्षित बिक्री शुरू कर दी है। नासिक से दिल्ली के लिए पहला ‘कांदा एक्सप्रेस’ रवाना किया गया है, जबकि दूसरे प्रमुख शहरों तक सड़क मार्ग से प्याज पहुंचाया जा रहा है। सरकार ने NCCF, NAFED, केंद्रीय भंडार और अन्य माध्यमों से प्याज ₹35 प्रति किलो बेचने की तैयारी की है।

सरकार का दावा है कि देश में प्याज की उपलब्धता पर्याप्त है और 2025-26 में उत्पादन करीब 307.37 लाख टन रहने का अनुमान है। इसके बावजूद मौसमी मांग बढ़ने से पहले ही कीमतों को नियंत्रित करने की कवायद शुरू हो गई है। सवाल यह है कि जब सरकार को ओणम, गणेश चतुर्थी, दुर्गा पूजा, दशहरा, दीपावली और विवाह सीजन में मांग बढ़ने का अनुमान पहले से था, तो बाजार प्रबंधन की तैयारी इतनी देर से क्यों दिखाई दे रही है?

सरकार ने 2026-27 के लिए 2 लाख टन रबी प्याज बफर बनाने का लक्ष्य रखा था, जिसमें अब तक करीब 1.21 लाख टन खरीद की गई है। दूसरी ओर अप्रैल-जून 2026 के दौरान करीब 3.82 लाख टन प्याज का निर्यात भी हुआ। यहीं से नीति पर सवाल और गहरे होते हैं। यदि आने वाले महीनों में घरेलू मांग और कीमतों का दबाव अनुमानित था, तो निर्यात नीति में उसी समय पर्याप्त सावधानी क्यों नहीं बरती गई?

आलोचना का दूसरा पहलू यह है कि कीमतों में दबाव बढ़ने के बाद सरकार बफर स्टॉक खोलकर ₹35 किलो पर बिक्री कर रही है। यानी बाजार में असंतुलन पैदा होने के बाद सरकारी हस्तक्षेप सामने आया। इससे यह सवाल भी उठता है कि उत्पादन, भंडारण, निर्यात और घरेलू मांग के बीच बेहतर तालमेल पहले क्यों नहीं बनाया गया।

बिचौलियों और व्यापारिक तंत्र की भूमिका पर भी निगाह जरूरी है। किसानों से खरीद और उपभोक्ताओं तक बिक्री के बीच कीमतों का अंतर आखिर किसकी कमाई बढ़ाता है? यदि किसान को उचित मूल्य नहीं मिलता और उपभोक्ता महंगा प्याज खरीदता है, तो लाभ की बड़ी हिस्सेदारी किसके पास जाती है?

सरकार का दावा है कि उपभोक्ता हित और किसानों के लाभ के बीच संतुलन बनाया जाएगा। लेकिन असली कसौटी यही होगी कि किसान को लागत से बेहतर दाम मिले और उपभोक्ता को अनावश्यक महंगाई से राहत।

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