फूलों से सजे रथ पर नगर भ्रमण को निकले भगवान जगन्नाथ, उमड़ा आस्था का सैलाब
ऐशबाग स्थित श्री गौड़ीय मठ, मोतीनगर से निकली भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की भव्य रथयात्रा ने राजधानी को भक्तिरस में सराबोर कर दिया। फूलों से सुसज्जित लकड़ी के रथ पर रंग-बिरंगे वस्त्रों, रत्नजड़ित पगड़ी, पीताम्बर और दिव्य आभूषणों से अलंकृत भगवान के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु सड़कों पर उमड़ पड़े।
विधि-विधान से हुआ शुभारंभ
रथयात्रा का शुभारंभ मठाध्यक्ष श्रीपाद भक्ति सुलभ श्रमण महाराज (सुधा सिंधु महाराज) ने वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-अर्चना, चंदन-कपूर मिश्रित जल से रथ का अभिषेक और महाआरती के साथ किया। इसके बाद भक्तों ने भगवान की काष्ठ प्रतिमाओं को कंधों पर उठाकर जयघोष के बीच रथ पर विराजमान कराया।
हर मार्ग पर गूंजे जय जगन्नाथ के जयकारे
रथयात्रा में सबसे आगे संतगण सिर पर माता तुलसी को धारण किए चल रहे थे, जबकि उनके पीछे चैतन्य महाप्रभु का भव्य चित्र शोभायमान था। मृदंग और संकीर्तन की मधुर धुनों के बीच “जय जगन्नाथ स्वामी”, “हरि बोल”, “राधे-राधे” के उद्घोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने मार्ग में झाड़ू लगाकर और रथ की रस्सी खींचकर स्वयं को धन्य माना।
जगह-जगह हुआ भव्य स्वागत
रथयात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों पर पुष्पवर्षा, पूजन-अर्चन और महाआरती की गई। शकुंतलम भवन के श्रद्धालुओं ने कमल मालाएं अर्पित कर भगवान का स्वागत किया, जबकि गणेशगंज में मित्तल परिवार ने विशेष भोग एवं महाआरती का आयोजन किया। मंदिर समिति ने श्रद्धालुओं को पूड़ी, बूंदी और मीठे चावल का प्रसाद वितरित किया।
एकता और समरसता का संदेश
मोतीनगर से शुरू होकर ऐशबाग रोड, नाका हिंडोला, बांसमंडी, लाटूश रोड, अमीनाबाद और गणेशगंज होते हुए पुनः मठ पहुंची यह यात्रा सामाजिक समरसता और समानता का संदेश देती रही। देश के विभिन्न राज्यों—असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, दिल्ली, मुंबई, मथुरा, वृंदावन, प्रयागराज, काशी और पटना से आए संत-महात्माओं ने भी इसमें भाग लिया।
‘भगवान स्वयं भक्तों के द्वार आते हैं’
समापन अवसर पर मठाध्यक्ष सुधा सिंधु महाराज ने कहा कि अन्य तीर्थ यात्राओं में भक्त भगवान के दर्शन को जाते हैं, लेकिन जगन्नाथ रथयात्रा की विशेषता यह है कि स्वयं भगवान अपने भक्तों के बीच आते हैं। उन्होंने कहा कि रथ की रस्सी खींचना केवल परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, सेवा, समर्पण और मोक्ष का प्रतीक है। इसी कारण यह यात्रा सदियों से समाज में एकता, प्रेम और समानता का संदेश देती आ रही है।
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