आरबीआई के ताज़ा आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता, एक वर्ष में दोगुना हुआ खाद्य ऋण
सरकारी खरीद व्यवस्था के लिए बैंकों पर बढ़ती निर्भरता के संकेत
वित्तीय समावेशन की पाठशाला समाचार पटल
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों ने देश की खाद्य खरीद प्रणाली और बैंकिंग क्षेत्र के बीच बढ़ती वित्तीय निर्भरता को उजागर किया है। सार्वजनिक खाद्य खरीद एजेंसियों को दिया जाने वाला फूड क्रेडिट 1.20 लाख करोड़ रुपये से अधिक बना हुआ है। हालांकि पिछले पखवाड़े की तुलना में इसमें मामूली कमी दर्ज की गई है, लेकिन एक वर्ष के भीतर इसका लगभग दोगुना हो जाना कई आर्थिक और बैंकिंग विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
आरबीआई के अनुसार, 15 जुलाई 2026 तक अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का बकाया फूड क्रेडिट ₹1,20,730.44 करोड़ रहा। इससे पहले 30 जून 2026 को यह ₹1,32,049.25 करोड़ था, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह केवल ₹58,992.85 करोड़ था। यह आंकड़ा बताता है कि सरकारी खाद्य खरीद व्यवस्था के वित्तपोषण में बैंकों की भूमिका तेजी से बढ़ी है।
आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि फूड क्रेडिट में भारतीय खाद्य निगम (FCI) तथा राज्य सरकारों एवं उनकी खरीद एजेंसियों को खाद्यान्न खरीद एवं भंडारण के लिए दिए गए ऋण शामिल हैं। यही एजेंसियां न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को संचालित करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों और खाद्य सुरक्षा के लिए यह व्यवस्था आवश्यक है, लेकिन यदि सरकारी खरीद का वित्तीय बोझ लगातार बैंकों पर बढ़ता रहा तो इससे बैंकिंग प्रणाली की तरलता, ऋण वितरण क्षमता और पूंजी प्रबंधन पर दीर्घकालिक दबाव पड़ सकता है।
आंकड़ों के अनुसार, अनुसूचित सहकारी बैंकों का फूड क्रेडिट भी ₹52,074 करोड़ पर स्थिर बना हुआ है। इससे स्पष्ट है कि खाद्य खरीद व्यवस्था के वित्तपोषण में पूरे बैंकिंग तंत्र की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।
ऐसे समय में जब देश आत्मनिर्भर कृषि, खाद्य सुरक्षा और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन साधने का प्रयास कर रहा है, आरबीआई के ताज़ा आंकड़े यह संकेत देते हैं कि सार्वजनिक खाद्य खरीद की मौजूदा व्यवस्था का वित्तीय भार भविष्य में बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण नीति-चुनौती बन सकता है।
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