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GDP के आंकड़ों पर बड़ा सवाल: महंगाई बढ़ी तो मैन्युफैक्चरिंग का GVA डिफ्लेटर ‘माइनस’ कैसे?

सरकार की सफाई में डबल डिफ्लेशन का तर्क, लेकिन आम आदमी के लिए महंगाई और GDP के आंकड़ों की तस्वीर अब भी उलझी

वित्तीय समावेशन की पाठशाला | समाचार पटल

 देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े नए GDP आंकड़ों ने एक बार फिर आंकड़ों की भाषा और आम आदमी की जेब के बीच के फर्क को सामने ला दिया है। सरकार ने Q1 2026-27 के GDP अनुमानों को लेकर उठ रहे सवालों पर विस्तृत सफाई जारी की है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के -1.5 प्रतिशत के इम्प्लिसिट GVA डिफ्लेटर ने आर्थिक आंकड़ों की पारदर्शिता पर बहस को तेज कर दिया है।

सरकार का कहना है कि मैन्युफैक्चरिंग में नकारात्मक डिफ्लेटर का मतलब यह नहीं है कि उत्पादों की कीमतें घट गईं। नई डबल-डिफ्लेशन पद्धति में उत्पादन और इनपुट की कीमतों को अलग-अलग समायोजित किया जाता है। जब इनपुट कीमतें आउटपुट कीमतों से तेज बढ़ती हैं, तो ऐसा परिणाम सामने आ सकता है।

लेकिन सवाल यह है कि जब इनपुट कीमतों में 14 प्रतिशत और आउटपुट कीमतों में 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, तब वास्तविक GVA वृद्धि 17.5 प्रतिशत और नाममात्र GVA वृद्धि सिर्फ 12 प्रतिशत कैसे दिखाई गई? सरकार के उदाहरण में यही अंतर नकारात्मक इम्प्लिसिट डिफ्लेटर की वजह बताया गया है।
Q1 2026-27 में मैन्युफैक्चरिंग का वास्तविक GVA 9.2 प्रतिशत बढ़ा, जबकि नाममात्र GVA वृद्धि 7.7 प्रतिशत रही। सरकार के अनुसार इसी अंतर से -1.5 प्रतिशत का डिफ्लेटर सामने आया।

₹86 लाख करोड़ से ₹80 लाख करोड़ तक का सवाल

GDP आंकड़ों को लेकर दूसरा बड़ा विवाद पिछले साल के Current GDP अनुमान को लेकर है। पुराने 2011-12 आधार वर्ष की श्रृंखला में Q1 2025-26 का GDP ₹86.05 लाख करोड़ था, जबकि नई 2022-23 आधार वर्ष श्रृंखला में यह पहले ₹80.32 लाख करोड़, फिर ₹80.44 लाख करोड़ और बाद में ₹80 लाख करोड़ किया गया। सरकार इसे आधार वर्ष बदलने, नई पद्धति और नए आंकड़ों के समावेश से हुई क्रमिक समीक्षा बता रही है।

सरकार ने साफ किया है कि पुराने और नई श्रृंखला के आंकड़ों की सीधी तुलना उचित नहीं है। फिर भी इतने बड़े अंतर ने आर्थिक आंकड़ों को लेकर आम लोगों और विशेषज्ञों के बीच सवाल जरूर खड़े किए हैं।

CPI, WPI और GDP Deflator की अलग-अलग तस्वीर

एक और पेचीदा पहलू यह है कि GDP का इम्प्लिसिट डिफ्लेटर 2.5 प्रतिशत बताया गया, जबकि CPI 3.9 प्रतिशत और WPI 9 प्रतिशत से अधिक था। सरकार का तर्क है कि तीनों सूचकांक अलग-अलग वस्तुओं, सेवाओं और भार को मापते हैं।

यानी कागज पर अर्थव्यवस्था की तस्वीर और बाजार में दिखाई देने वाली महंगाई एक जैसी होना जरूरी नहीं है। यही अंतर GDP आंकड़ों को आम नागरिक के लिए और अधिक जटिल बना देता है।

 

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