वित्तीय समावेशन की पाठशाला

लखनऊ के RBI बोर्ड रूम में 13 अगस्त 2026 को MSME की 79वीं सशक्त समिति की बैठक तो संपन्न हो गई, लेकिन इस ‘सशक्त’ समिति की बैठकों के पीछे की हकीकत बेहद कमजोर और निराश करने वाली है। 79 बैठकों का लंबा सफर तय करने के बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) के उद्यमियों के लिए सरकारी योजनाएं आज भी महज कागजी पुलिंदा बनकर रह गई हैं।
इस दिखावटी समीक्षा बैठक में रिज़र्व बैंक (RBI), नाबार्ड, सिडबी और MSME विभाग के तमाम बड़े अधिकारी मौजूद थे। लेकिन बैठक में डिक्की (DICCI) के प्रतिनिधि देव मणि सरोज और नीतू जी ने जो कड़वी सच्चाई बयान की, उसने सिस्टम की पोल खोल कर रख दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कैसे बैंक और वित्तीय संस्थान SC/ST उद्यमियों को कर्ज देने में आनाकानी करते हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक पहुंचने ही नहीं देते।
बैठक में उजागर हुई सिस्टम की नाकामी:
योजनाएं सिर्फ फाइलों में: विभागों के पास योजनाओं के बड़े-बड़े नाम हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उद्यमियों को इनकी कोई जानकारी ही नहीं दी जाती। जागरूकता के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही है।
भ्रष्टाचार और लालफीताशाही: आवेदन करने वाले उद्यमियों को बिना किसी व्यावहारिक मदद (हैंडहोल्डिंग) के कागजी कार्रवाई के मकड़जाल में उलझा दिया जाता है, जिससे थक-हार कर वे पीछे हट जाते हैं।
बैंकों की घोर लापरवाही: विभागों और बैंकों के बीच तालमेल का पूरी तरह अभाव है। महीनों तक फाइलें धूल फांकती रहती हैं, लेकिन पात्र SC/ST उद्यमियों के ऋण समय पर न तो स्वीकृत होते हैं और न ही वितरित किए जाते हैं।
अधिकारियों ने हर बार की तरह इस बार भी “सकारात्मक आश्वासन” देकर पल्ला झाड़ लिया। लेकिन सवाल यह है कि जब 78 बैठकों में कोई ठोस बदलाव नहीं आया, तो 79वीं बैठक से क्या चमत्कार हो जाएगा? यह बैठक इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि वित्तीय समावेशन के नाम पर सरकार और बैंक सिर्फ खोखले वादे कर रहे हैं, जबकि असल में SC/ST उद्यमियों को व्यवस्था के चक्रव्यूह में घुटने टेकने पर मजबूर किया जा रहा है।
Vittiya Samaveshan Ki Pathshala
